Press "Enter" to skip to content

Category: हिन्दी

आजकल


[Painting by Amita Bhakta]

वक्त भी चलते हुए गभरा रहा है आजकल,
कौन उसके पैर को फिसला रहा है आजकल ?

रास्ते आसान है पर मंझिले मिलती नहीं,
हर कोई पत्थर से क्यूँ टकरा रहा है आजकल ?

न्याय का दामन पकडकर चल रही है छूरीयाँ,
सत्य अपने आपमें धुँधला रहा है आजकल

पतझडों ने नींव रिश्तों की हिला दी इस तरह,
पैड खुद पत्तो से यूँ कतरा रहा है आजकल

आप के चहेरे की खुश्बु को सलामत राखिये,
एक भँवरा आप पर मंडरा रहा है आजकल

वक्त की नादानियत या बेकरारी प्यार की,
कौन ‘चातक’ मोम को पिघला रहा है आजकल ?

– © दक्षेश कोन्ट्राकटर ‘चातक’

7 Comments

गिनाये भी नहीं जाते

हिन्दी में गज़ल लिखनी मैंने अभी-अभी शुरू की है।
इस ब्लोग पर हिन्दी में प्रस्तुत की गई यह मेरी प्रथम गज़ल है ।
यह आपको कैसी लगी ये जरूर बताईयेगा, आपके प्रतिभावों का मुझे इंतजार रहेगा ।

कई किस्से मुहोब्बत के सुनाये भी नहीं जाते
मिले जो घाव अपनों से, बताये भी नहीं जाते

उदासी थामकर दामन हमारे घर चली आयी,
कई महेमान एसे है भगाये भी नहीं जाते

हमें मालूम है की अश्क मोतीओं से बहेतर है
मगर आंसू को धागों में पिरोये भी नहीं जाते

गरीबी झेलना शायद जरा आसान हो जाता,
नमक के साथ आंसू को पकाये भी नहीं जाते

बिना पूछे चले आये वो मेरी नींद में अक्सर,
परीन्दो की तरह सपनें उडाये भी नहीं जाते

खुदा के नाम से डरता नहीं अब कोई आलम में
बुरे इन्सान को मंदिर बिठाये भी नहीं जाते

गिला-शिकवा जरूरी है मुहोब्बत की कहानी में,
मगर ‘चातक’ यहां किस्से गिनाये भी नहीं जाते

– दक्षेश कोन्ट्राकटर ‘चातक’

14 Comments